"मोक्ष धाम - गया तीर्थ"

!! श्री हरिदास !!

वैज्ञानिक युग में भी पितृपक्ष और गया का महत्व
प्राकृतिक सौंदर्य – सुषमा से आच्छादित, सात पर्वत मालाओं से घिरा, निरंजना उद्गमित अन्तः सलिला ‘फल्गु नदी‘ के पष्चिमी छोर पर बसा अति प्राचीन एवं धार्मिक शहर ‘गया‘ भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है । श्राद्ध एवं पिण्डदान के लिये प्रसिद्ध गया वेदों के अनुसार भारत की सप्त प्रमुख पुरियों में अपना एक अलग स्थान रखता है । पुराण के अनुसार यह एक मुक्तिप्रद तीर्थ स्थल है । यहॉ प्रत्येक वर्ष भाद्र पक्ष की चतुदर्षी से आष्विन पक्ष की अमावस्या पर सत्तरह दिनों का पितृपक्ष मेला लगता है । इसे पितृपक्ष या पितरों का पक्ष (पखवारा) भी कहा जाता है । इस अवसर पर देष-विदेष के लाखों हिन्दू धर्मावलम्बी अपने पूर्वजों के नाम श्राद्ध, वर्तण एवं पिण्डदान करने के लिये यहॉ आते है । ऐसी मान्यता है कि इस पुण्य क्षेत्र में पिता का श्राद्ध करके पुत्र अपने पितृऋण से हमेषा-हमेषा के लिये उऋण हो जाता है । उनके द्वारा किये गये इस पवित्र कार्य से उनके पूर्वजों की भटकती आत्मा को शान्ति मिलती है । वे प्रेतत्व से मुक्त हो जाते हैं । साथ ही पितरों की प्रसन्नता से श्राद्धकर्ता को भविष्य में धन-धान्य और सुख-समृद्धि व सम्पत्ति की प्राप्ति होती है ।
इतिहास साक्षी है कभी यहॉ तीन सौ पैंसठ वेदियॉ थी जिस पर हिन्दू तीर्थ यात्रियों द्वारा प्रतिदिन पिण्डदान करने का विधान था । तब उस समय लोगों के पास भी समय सीमा की कोई बाध्यता नहीं थी । पूरी निष्चिंतता एवं इत्मीनान के साथ वे यह कार्य सम्पादित करते थे ।
परम्परा के यहॉ पिण्डदान करने-कराने का भार यहॉ के गयापाल पंडों के ऊपर रहा है । शास्त्र के अनुसार गया के ये आदि ब्राह्मण श्राद्धकर्म के लिये अत्यंत ही पूज्य माने जाते हैं तथा बिना इनकी उपस्थिति एवं सहायता के यात्रियों को गया श्राद्ध की पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती है । यह गयापाल पण्डे यात्रियों को अपने यहॉ वर्षो पूर्व बने आवासों में ठहराते हैं । बाहर से आने वाले यात्रीगण भी अपनी तत्सम्बन्धी सुविधा को देखते हुए उनके संरक्षण में ही रहना ज्यादा उचित समझते हैं किन्तु वर्षो पुरानी यह परम्परा आज पूरी तरह दम तोड़ने लगी है । यही वजह है कि इन अव्यवस्थाओं के मद्देनजर पिछले तीन-चार वर्षो से स्थानीय प्रषासन ने यह भार स्वयं ही यात्रियों के हित में उठाना शुरु कर दिया है । यहॉ की विभिन्न धर्मषालाओं में भी यात्रियों के ठहरने की उचित व्यवस्था है । यहॉ की इन धर्मषालाओं का भी यत्किचित इतिहास रहा है । इन धर्मषालाओं के निर्माण के पीछे कुछ प्रवासी सेठ साहुकारों का सराहनीय योगदान रहा है । आज भी ये धर्मषालाएॅ उन सेठ-साहुकारों की धार्मिक भावना का अप्रतिम उदाहरण है ।
 
*भारतदेश में कई सिद्ध और प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है और *सबके*अपने अपने महत्व है* *लेकिन*गया तीर्थ का महत्व सबसे सर्वोच्च श्रेणी का हे, क्यू की गया तीर्थ की यात्रा और एक दिन के पिण्ड-श्राद्ध कर्म मात्र से पुत्र प्राप्ति सहित नाना प्रकार के सुख वैभव के द्वार खुल जाते हे, क्यू कि गया तीर्थ आत्माओं की मुक्ति का परम पावन तीर्थ है। विष्णु पुराण – पद्म पुराण – वायु पुराण में गया तीर्थ और तीर्थ में किये गए श्राद्ध  कर्म के आशीर्वाद का अपना विशेष महत्व हे, गया तीर्थ श्राद्ध करवाने मात्र से जीवन में उन्नती के कई प्रामाणिक उदाहरण है, लेकिन आधुनिकता के बढ़ते प्रचलन के चलते इंसान सुख से दुःख की और अनायास ही बढ़ चुका है।*

                                                                                                                              

*संपूर्ण ब्रह्माण्ड रूपी – विश्व के धार्मिक इतिहास में पहली बार ! “मोक्ष धाम गया तीर्थ” समस्त पितृ देवता की तृप्ति और समस्त  परिवारों की ख़ुशी के लिए एक भव्य आयोजन किया जा रहा है*

*हमारे भारत के कई कई परिवारों के लोग अकस्मात् और अकाल मृत्यु के कारण अपना अनमोल मनुष्य शरीर समय से पहले छोड़ चुके हे! कुछ लोग सोचते है कि* *आत्महत्या के  बाद , इंसान दुःखो से मुक्त हो जाता है। कुछ लोग अचानक दुर्घटना में म्रत्यु को प्राप्त हो जाते हे, जैसे सड़क – रेल – हवाई, जहाज : दुर्घटना, बम – दंगा – आतँकवाद – हत्या – आत्महत्या , इस तरह के अन्य कई कारणों से जीवित मनुष्य अचानक से *दुर्घटना*का शिकार हो *अकस्मात*मौत*के साथ शरीर छोड़कर चला जाता है*
*गर्भपात*, *भ्रूणहत्या* *प्राकृतिक आपदा*, *गर्भवती मृत्यु*, और *समस्त* *प्रकार* की *मृत्यु* से *मृत* *मृतआत्मा, चेन से नही रहती ना ही वह चेन से रहने देती। क्यू की उसकी आत्मा की मुक्ति उसे शास्त्रोक्त अनुसार ही चाहिए, इंसान के बनाये हुए नियम सिर्फ संसार और शरीर तक ही सीमित है, भटकती आत्मा अपने ही परिवार वालो से आशा और उम्मीद करती है कि कोई उसका त्रिपिंडी और  गया श्राद्ध कर आये और उसके लिए जब वह अपने ही परिवार द्वारा तृप्त नही होती है तो उस कारन परिवार में कई कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होती रहती है, कई लोगो का वंश नही बढ़ पाता, कई लोगो की शादी नही हो पाती, कई लोगो की शादी तो हो जाती है लेकिन पारिवारिक जीवन में सुख की जगह क्लेश आकर स्थायी निवास कर जम सा जाता है, मनुष्य समस्त दुःखो से हारकर पंडित और ज्योतिषों के पास जाता है, कई समझदार ज्योतिष समस्त दुःखो से मुक्ति पाने के और भविष्य में ख़ुशी को पाने की चाहत रखने वालों को पितृ दोष – नासिक कल सर्प दोष निवारण, उज्जैन में मंगलनाथ, हरिद्वार में नारायनशीला और इन “सबसे “प्रथम” और “अंत” मोक्ष धाम गया में फल्गु नदी , श्री विष्णुपाद , सीता-कुंड, और अक्षय वट स्थानों पर त्रिपिंडी और गया श्राद्ध श्रद्धा पूर्वक करने की सलाह देते है। और आज तक कई हजारो लाखो ऐसे मनुष्य हे जो यहाँ आकर आत्मा से अपने परिवार के अकस्मात मृत्यु से भटक रहे लोगो की आत्मा की मुक्ति के उद्देश्य से यहाँ आते है और आश्चर्यजनक परिणाम पाकर खुश रहते है और कई व्यक्ति तो ऐसे हे जो प्रतिवर्ष यहाँ आकर त्रिपिंडी और गया श्राद्ध करवाने आते है। गया श्राद्ध का महत्व कई ग्रंथो में मिलता है, रामायण युग में “श्री राम” “सीता माता” और “लक्ष्मण” सहित अपने पिताजी “राजा दशरथ” की मृत्यु उपरान्त मोक्ष धाम गया ( बिहार ) में ही आये थे, उसी दिन सीता माता ने “गाय” “फल्गु नदी” ,’केतकी’ के फूल, और “ब्राह्मण” को श्राप दिया था, (पूरी कहानी के लिए यहाँ क्लिक करें) ! वही जगह “सीता कुंड” के नाम से आज प्रसिद्ध भी हे। उसी के पास फल्गु नदी है, जिसका विशाल सुन्दर स्वरूप  और अपार मुक्ति दिलाने की महिमा होने पर भी श्राप के कारण उसमे कभी जल नही रहता। भारत देश के अधिकाँश घरों में आज कोई न कोई समस्या बनी रहती है ! और “उन्हीके परिवारों में से उन्ही का  कोई पुराना या नया मनुष्य,”  ऊपर वर्णित कई कारणों से अचानक अकस्मात और अकाल मृत्यु से मृत होता है, शास्त्रानुसार जिस अकाल मृत्यु से मृत शरीर की  आत्मा को जब तक शांति नही मिलती, जब तक उसके वंश – कुल परिवार का  व्यक्ति उस भटकती आत्मा की शांति ” मोक्ष तीर्थ धाम -गया ( बिहार ) में नहीं करा देता।  गरुण पुराण , विष्णु पुराण, रामायण के साथ विश्व में सबसे प्राचीन धर्म, सनातन धर्म के कई ग्रंथो और पुराणों में अकाल मृत्यु और गया में भटकती मुक्ति का उल्लेख है जो की सतयुग से शास्त्रोक्त वर्णित है,  लेकिन !! दुर्भाग्य वश आज के कई शिक्षित वर्ग ने और उनकी युवा संतानों ने इन बातों को मानना छोड़ दिया, और अफ़सोस ” इंसान ने शाश्त्रो को मानना छोड़ दिया, तो! शास्त्रो ने मनुष्य को अपनाना छोड़ दिया, लेकिन उस से बड़ा अफ़सोस यह कि इंसान शरीर के सुरक्षित रहते हुए इन बातों को नहीं मानता लेकिन अंत में समस्त प्रकार के उपाय और सारे हथकंडे अपनाने के बाद थक हारने के बाद, मजबूर होकर अपने परिवार कुल में अकाल मृत्यु से भटकते हुई आत्मा की मुक्ति हेतु ” श्री “मोक्षधाम-गया” श्राद्ध और त्रिपिण्डी करवाने आता  हे। काश वही इंसान समय रहते हुए पहले ही सम्भल जाये और विनाशः जैसी स्थिति आने से पहले, अपने ही कुल परिवारों में मृत भटकती आत्माओं की मुक्ति हेतु का पहले ही सोच ले, मात्र मन में संकल्प बनाने मात्र से चमत्कार दिखाई देने लगता है, क्यू की जब उस आत्मा को यह आभास होता है कि मैरे अपने कुल के लोग मैरी मुक्ति करवाने आने वाले हे तो वह आत्मा पहले ही प्रसन्न होकर क्रोधित और  बुरे की जगह आशीर्वाद देने लग जाती है, क्यू की उसे उसकज मुक्ति नजदीक महसूस होती है। यह सारी बाते चाहे पड़ने – समझने – सुनने में अजिब और आश्चर्यचकित जैसी लगे। लेकिन सारे शास्त्रानुसार ख़ुशी को निमंत्रण देने की शुरुआत करने का  सत्य सिर्फ यही है । इंसान के मानने या ना मानने से, ग्रन्थों में लिखा आत्मा का संबंध  और मुक्ति का सच, सच ही रहता, उसे जिंदा इंसान के मानने या ना मानने से कोई फर्क नही पड़ता, क्यों की यह विषय जिन्दा रहने तक का नही बल्कि शरीर की मौत और उसके बाद की शुरुआत का हे।*

*संपूर्ण विश्व में*कई ऐसे परिवार हे जिनके परिवारों में कोई अकाल मृत्यु से मृत हुआ है और उनके परिवारों से कोई भी उस आत्मा की मुक्ति हेतु गया जी नहीं आया, इसके कई कारण हो सकते हे, जैसे या तो कई लोगो को ” मोक्ष धाम गया का महत्व ही ज्ञात नही है, या फिर कई लोग आना चाहते लेकिन कई नाना प्रकार के असमंजस के कारण यँहा तक नही पहुँच सकता, गया श्राद्ध का कुल खर्च साधारणतः 4100 रूपये से लेकर 30000 तक होती है, 30000 वाले में श्रीमद भागवत जी उस मृतआत्मा के लिए की जाती है, यह अपनी अपनी आर्थिक परिथिति पर निर्भर करता है*।

*विश्व के इतिहास में पहली बार *श्री*मोक्षधाम* *गया* ( *बिहार* ) *में*  *विशाल कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है*
जिसके अंतर्गत 
१. *त्रिपिंडी*तर्पण*
२. *गया*श्राद्ध*
३.  *श्री भागवत कथा का पारायण अनुष्ठान*
४. *श्री भगवद्गीता का पारायण अनुष्ठान*
५. *ॐ नमो भगवते वासुदेवायः* *द्वादसोक्षर मन्त्र अनुष्ठान*
६. *वेदमाता गायत्री मंत्र अनुष्ठान*
. *श्रीमदभागवत कथा संगीतमयी प्रति सप्ताह अनुष्ठान*
( *प्रसारण आस्था चैनल पर) 
*AWESOME ORGANIZATION.COM द्वारा* 
*भटकती हुई और कई प्रकार की अधूरी इच्छाओं से अतृप्त आत्माओं की मुक्ति, और समस्त परिवारों के खुशहाली के  लिए , विश्व के समस्त ऐसे परिवारों को सादर आमंत्रीत करता है, जिनके परिवारों में पुराने या नए समय में किसी की अकाल मृत्यु हुई हो।* *उन भटकती हुई आत्माओं की मुक्ति हेतु,मोक्ष धाम गया में कई विद्वान पंडितों द्वारा भव्य सामूहिक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।*  *जिसकी अनुदान राशि मात्र 3551/-  रखी गई है। इसके अंतर्गत देश से विदेश के भक्त श्रद्धालुओं के लिए समस्त व्यवस्था AEESOMEORG.COM द्वारा होगी। जिसके अंतर्गत गया स्टेशन से- ठहरने तैयार होने की जगह तक का वाहन, स्नान के लिए गर्म पानी, स्वादिष्ट चाय, फलाहार, खिचड़ी भरपेट व्यवस्था, उसके बाद एक तय समय पर फल्गु नदी में त्रिपिंडी तर्पण, उसके बाद गया श्राद्ध, उसके बाद 1.सीता कुंड, 2.फल्गु नदी, 3.अक्षय वट और 4.मुख्य ” श्री विष्णु पाद” में पिंड दान, उसके तुरंत बाद , गर्मा-गर्म स्वादिष्ट पूड़ी-सब्जी, मीठी बूंदी और नमकीन सेव का भरपेट भोजन, तत्पश्चात श्री मद् भागवत कथा श्रवण और उसी रात अपने प्रस्थान के समयानुसार, रुकने के स्थान से गया स्टेशन तक का वाहन और जाते समय 500 रूपये कीमत का एक अनूठा चित्रात्मक मानवीय आत्मिक संस्करण, गया महात्म्य की 2 पुस्तकें और दो व्यक्तियों के भोजनानुसार एक समय की पूड़ी-सब्जी, मीठी बूंदी और नमकीन सेव अगली सुबह के लिए , और गया तीर्थ  पंडित जी के शुभ आशीर्वाद सहित समस्त भिन्न भिन्न जगहों से आये हुए महानुभावो को विदाई देने तक की व्यवस्था AWESOMEORG.COM और स्थानीय तीर्थ पुरोहित  पंडित जी श्री माखन लाल जी बारिक (सोने के कड़े वालो) गया धाम, द्वारा की जायेगी। उसके पश्चात एक महीने तक इस कार्यक्रम में आपकी उपस्थिति और आपके कार्यक्रम की वीडियो कैसेट और साथ में समय और उपलब्धता के आधार पर श्री विष्णु पाद गया तीर्थ का भगवान श्री विष्णु का चरण वस्त्र फ्रेम श्री विष्णु भगवान की विशेष कृपा और पूजा हेतु, सबको अपने अपने पते पर भेज दिया जायेगा।*   *1.आपके अपने घर के गया तीर्थ पुरोहित जी की भेंट,*
*2.कर्म करवाने वाले पंडित जी की दक्षिणा,* 
*3.गौ दान,* 
*4.वस्त्र दान,* 
*5.अन्न दान,* 
*6.विष्णुपाद भेंट,* 
*7.भोगराग रसीद,* 
*8.वाहन,* 
*9.भोजन,* 
*10.भागवत जी,*
*11.गायत्री मंत्र और अन्य समस्त जप पारायणअनुष्ठान* 
*13.तनाव मुक्ति संस्करण 12. दो व्यक्तियों के कुल तीन समय के भोजन प्रसाद सहित समस्त गया तीर्थ श्राद्ध तर्पण की कुल सेवा राशि मात्र 3551/- रखी गई  है!*
*वितरण और कार्यक्रम भागीदारी सर्वप्रथम बुकिंग पहले आओ पहले पाओ के आधार पर, लिमिटेड संख्या होने के कारण इस कार्यक्रम में एक निश्चित संख्या से ज्यादा को शामिल नहीं किया जा सकेगा।  पहला आयोजन 4 फरवरी 2019 से 6 मार्च 2019 सोमेती अमावस्या से शुरू होकर अगली अमावस्या तक “तीर्थ श्राद्ध” कार्यक्रम का विशेष आयोजन रखा गया है।*
*बुकिंग 12 नवम्बर से शुरू। समस्त अतृप्त आत्माओं की मुक्ति और समस्त परिवारों की ख़ुशी मात्र ही हमारा मुख्य उद्देश्य और स्वार्थ हे।*
*समस्त भारतीयो के लिए ख़ुशी की शुरुआत।*

*आवेदन करने के लिए www.awesomeorg.com पर सम्पर्क करें।*

सीता कुंड

रामगया  – सीताकुण्ड

विष्णुपद मंदिर के ठीक सामने फल्गु नदी के दुसरे किनारे पर सीता कुण्ड हे, यहाँ काले पत्थर का  महाराजा  दशरथ का हाथ बना हुआ हे, वहीँ पर एक शीला हे जो भरताश्रम  वेदी कहलाती हे, यहाँ मातंग ऋषि का चरण चिन्ह हे, तथा अनेक देव मूर्तियाँ हे !

राजा दशरथ का पिंड श्राद्ध का पिंड दान सीता माता ने यही किया था , और तब से ही सीता माता के श्राप के कारण फल्गु नदी आज तक सुखी हुई हे, वह विश्व में एक मात्र सबको मोक्ष दायिनी हे लेकिन स्वंय एक झूंठ बोलने के कारण सीता माता के श्राप से श्रापित हे !

हिन्दू धर्म की  सबसे पवित्र माता गौ माता की आज जो हालत हो रही हे वह भी उसी समय के सीता माता के श्राप से श्रापित होने के कारन हे! गौ माता सबको वेतरणी  नदी पार कराती हे, लेकिन स्वंय झूंठ बोलने के कारन से श्रापित होने के कारन इस दशा के लिए  मजबूर हे !
 
तुलसी  माता भी वहीँ पर झूंठ बोलने से श्रापित हे की तुम कितनी भी पवित्र रहोगी लेकिन गन्दी जगह में हरी भरी रहोगी !
 
ब्राह्मण भी वहीं झूंठ बोलने के कारण, से सीता माता के श्राप द्वारा श्रापित हे, की तुम्हे चाहे जितना भी  धन  मिल जायेगा, कितना ही मिलेगा लेकिन असंतुष्ट रहोगे !
 
वहां सिर्फ अक्षयवट ने सत्य बोला था तो सीता माता ने इन्हें  इन्हें वरदान दिया था की तुम्हारे यहाँ आकर जो कोई भी श्रद्धा से धन – पुत्र – भक्ति – मुक्ति मांगेगा उसे वही प्राप्त होगी !
 
यह घटना उस समय की हे जब राजा राम जी के पिता दशरथ जी का राम विरह की चिंता के कारण परलोकगमन हो गया था , तब श्री रामजी, लक्ष्मण जी, और  सीता माता यहाँ आये थे, श्री राम लक्ष्मण दोनों श्राद्ध सामग्री एकत्रित करने के लिओये गए थे, लेकिन जब काफी देर समय तक नहीं लोटे और सीता माता ने देखा की संध्या हो जाएगी अगर यह तर्पण श्राद्ध  कार्य जल्दी ही पूरा नहीं किया तो संध्या के बाद नहीं हो पायेगा, यह सोच कर सीता माता ने नदी की रेत पिंड बनाये और क्षमा मांगते हुए बालू के ही पिंडो से पिंडदान कर दिया, जब राम जी लौटे तब सीता माता ने कहा की मैने समय की अधिक देरी को देखते हुए राजा दशरथ का पिंडदान कर दिया हे, लेकिन राम जी ने इस बात पर विश्वास नहीं किया की एसा केसे हो सकता हे , और सीता माता को कहा की अगर तुमने पिंडदान कर दिया हे तो सबुत और गवाह दो , तब सीता माता ने फल्गु नदी से गवाही देने की कहा कि मैने आपसे ही रेत लेकर पिंडदान किया हे, लेकिन फल्गु नदी राम जी के क्रोध के कारण डर गई और झूंठ बोल दिया कि मैने नहीं देखा, तब सीता माता ने ब्राह्मण से गवाही देने की कहा कि तुमने तो स्वंय कर्म करवाया हे लेकिन ब्राह्मण ने भी राम जी के क्रोध  से डरकर झूंठ बोल दिया, कि  मैने नहीं देखा, फिर तुलसी से पूछा, फिर गौ माता से गवाही देने की कहा, लेकिन सभी ने झूंठ बोल दिया!  लेकिन वंही स्थित अक्षय वट ने इस बात का  सत्य ज्यो की त्यों वर्णन कर दिया, तब सीता माता ने इन चारो झूंठ बोलने वालो को श्राप और अक्षयवट को अक्षय वरदान दिया!, सभी आज भी वंही साक्षात् हे !

विष्णु पद

 विष्व प्रसिद्ध विष्णुपद मन्दिर
गया का प्रसिद्ध विष्णुपद मन्दिरस्थापित्य कला का उत्कृष्ट नमूना है, जिसका पुनरोद्धार एवं निर्माण कार्य इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया  था । अहिल्याबाई भारतीय इतिहास की एक अनमोल रत्न थी, जो एक उज्जवल नक्षत्र की तरह आकाष में वर्षो तक चमकती रहेगी । वे गंगा-जमुना की तरह पवित्र और सीता-सावित्री की तरह पूज्य थीं । इनकी गिनती भारत की उन प्रसिद्ध नारियों में की जाती हैं जिन्होंने प्रजा पर नहीं, बल्कि उनके ह्नदय पर एक महान माता के समान वात्सल्यमय शासन किया है । भूरे रंग के पत्थर से निर्मित इस मन्दिर को बनवाने के लिये अहिल्याबाई ने जयपुर के प्रसिद्ध प्रस्तर स्थापित्यकारों को बुलवाया था । इस मन्दिर में भगवान विष्णु के चरण चिह्न हैं ।

दिनाक 6 मार्च 2019 से

Payment Details

Bank : SBI Mathura
Name : All way Education system of Mental Environment
Account Number : 38129845238
IFSC : SBIN0000678

फल्गु नदी

फल्गु गया का प्रथम तीर्थ है । गया पहुँचकर सर्वप्रथम फल्गुतीर्थ में ही श्राद्ध सम्पन्न होता है । गया के तीर्थो में फल्गुका विषेष महत्व है । इसे गया का षिरोभाग तथा आभ्यन्नर तीर्थ कहा गया है । फल्गुतीर्थ में स्नान करके भगवान गदाधर का दर्षन करने से सभी पुण्यफलों की प्राप्ति होती है । भूतलपर समुद्र पर्यन्त जितने भी तीर्थ और सरोवर हैं, वे सब प्रतिदिन एक बार फल्गुतीर्थ में आया करते हैं । तीर्थराज फल्गु तीर्थ में जो श्रद्धा के साथ स्नान करता है, उसका वह स्नान पितरों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति कराने वाला तथा अपने लिये भोग और मोक्ष की सिद्धि करने वाला होता है (अग्निपुराण अ0 115/25-30) फल्गु अमृत की धारा बहाती है । यहॉ पितरों के उद्देष्य से किया हुआ दान अक्षय होता है । गया जाने पर प्रतिदिन फल्गु में स्नान कर अन्य पदों में श्राद्धादि की विधि है ।
  नारदपुराण में बताया गया है कि फल्गु तीर्थ में श्राद्ध करने से पितरों की तथा श्राद्ध कर्ता की भी मुक्ति होती है । पूर्वकाल में ब्रह्माजीकी प्रार्थना से भगवान विष्णु स्वयं फल्गुरुप से प्रकट हुए थे । समस्त लोकों में जो सम्पूर्ण तीर्थ हैं, वे सब फल्गु तीर्थ में स्नान करने के लिये आते हैं । गंगाजी भवान विषणु का चरणोदक हैं और फल्गु रुप में साक्षत भगवान आदिगदाधर प्रकट हुए हैं । वे स्वयं ही द्रव (जल) – रुप में विराजमान हैं, फल्गु में स्नान करते समय निम्न मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये –
फल्गुतीर्थ विष्णुजले करोमि स्नानमह्म वै । पितृणां विष्णुलोकाय भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये ।।
 
गया श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान की महत्वपूर्ण स्थली रही है, जिसमें फल्गु नदी (तीर्थ) का अवस्मिरणीय योगदान को नकारा नहीं जा सकता ं किसी भी देष के इतिहास विनिर्माण का प्रकृति प्रदत्त उपहारों के अन्तर्गत प्रथम स्थान पर आसीन नदी का अमूल्य योगदान माना जाता हे ं मानव के आरम्भि क्रिया-कलाप के हजारों वर्षो काएकमात्र प्रमुख सहायक तत्व एक रुप में नदी से जुड़ी लौकिक-अलौकिक कथाएँ प्रायः एकमत से स्वीकार्य हैं । प्राचीन नदी घाटी सभ्यता में प्रारम्भिक मानव बस्तियों का स्थापन और विकास इस तथ्य को सम्पुष्ट करता है । सही अर्थो में किसी भी नगर का महत्व नदी तटों पर अव्यवस्थित होने के कारण अन्य नगरों से द्विगुणितमाना जाता है, ऐसी ही एक विष्वविष्यात नदी (तीर्थ) है – ‘फल्गु‘ । 
      मगध के ह्नदय क्षेत्र गया के मध्य भाग में प्रवाहमान फल्गु ने गया के इतिहास को शुरु से ही उसी प्रकार प्रभावित किया है जैसे – गोदावरी ने नासिक को, सरयू ने अयोध्या को, मूसी ने हैदराबाद को, षिप्रा ने उज्जैन को, कावेरी ने कुम्भकोणम् को, मन्दाकिनी ने चित्रकूट को । कई दृष्टि से सर्म्पू भारतीय नदियों में श्रेष्ठ फल्गु नेमगध प्रदेष के इतिहास निर्माण के सहायक तत्व के रुप में शुरु से ही इस धराधाम के कण-कण को प्रभावित किया है, जिसकी परिपार्टी वर्तमान में भी देखी जा सकती है ।
     फल्गु के तट पर बसे होने की वजह से गया का महत्व अपने आप में विषिष्ट और अतुलनीय है ।
  गया के पूर्व में बहने वाली फल्गु के उद्भव के सन्दर्भ में कहा गया है कि ब्रह्माजी द्वारा जगत-कल्याण हेतु इसे स्वर्ग से पृथ्वी पर लाया गया है । ऐसे भगवान विष्णु के दाहिने पैर के अंगूठे से फल्गु का उद्भव भी स्वीकार किया जाता है । जिसे श्रद्धालु भगवान विष्णु की जलमूर्ति मानते हैं । कहा जाता है कि भगवान विष्णु के शरीर का सुगन्ध से ओत-प्रोत है फल्गु नदी इसलिये इसमें स्नान-पूजादि का अपना विषिष्ट महत्व है । फल्गु क कथा जगत-जननी माता सीताजी के गया आगमन से जुड़ी है हुआ यूॅ कि जब श्रीराम, भ्राता लक्षमण व माता सीताजी गया आये, दोनों भाई अपने पिताश्री के पिण्डदान की सामग्री लाने बाजार चले गये । उसी बीच आकाषवाणी हुई थी कि तुरन्त पिण्डदान दो यही शुभ-मूहूर्त है । माता ने पास बहते फल्गु, पास चरती गाय, केतकी, पुष्प और वटवृक्ष को साक्ष्य मानकर अपने ससुर को पिण्डदान कर दिया । पर यह क्या दोनों भाईयों के आने के उपरान्त पूछे जाने पर सिर्फ वटवृक्ष को छोड़कर तीनों ने झूठ बोल दिया इस पर कुपित हो माता सीताजी ने इसे सदैव अन्दर ही अन्दर बहने वाली नदी का श्राप दे दिया और फल्गु अन्तः सलिला हो गयी है । विष्व की इस अनूठी नदी की धार्मिक कथा की उपादेयता चाहे जितनी भी रही हो, भौगोलिक दृष्टि से भी फल्गु अति प्राचीन नदी है जिससे धीरे-धीरे बालू की राषि में वृद्वि होते रहने के कारण जलराषि नीचे चली गयी । यही कारण है आज भी आप जहॉ चाहें कितनी भी गर्मी में ही क्यों नहीं, हाथ से बालू हटाकर जल निकाल सकते है । यह उपरोक्त साक्ष्य यह स्पष्ट करने में पूर्ण सक्षम है कि फल्गु नदी, गया में पिण्डदान का एक फलदायी प्रमुख आधार है, जिसके बिना गया पिण्डदान कर्म असम्भव है ।  

अक्षय वट

गयाजी में अक्षयवअ के नीचे पितरों के निमित्त किया गया श्राद्ध तथा ब्राह्मण-भोजन अक्ष्य फलदायी और सभी पापों का विनाष करने वाला होता है –
पित्रादीनामक्षयाय सर्वपापक्षयाय च। श्राद्धं वटतले कुर्याद् ब्राह्माणानां च भोजनम् ।।  
(अग्निपु0 115/71)
पितरों को अक्षय ब्रह्मलोक प्राप्ति की कामना से निम्न मन्त्र से अक्षय वट का पूजन एवं नमस्कार करना चाहिये –
संसारवृक्षशस्त्रायाषेषपापक्षयाय च । अक्षरूयब्रह्मदात्रे च नामोऽक्षरूयवटाय च ।।
(वायुपु0 उत्तर 47/7)
जो संसार रुपी वृक्ष का उच्छेद करने के लिये शस्त्र स्वरुप हैं, जो समस्त पापों का नाष तथा अक्षय ब्रह्मलोक प्रदान करने वाले हैं, उन अक्षयवट स्वरुप श्रीहरि को नमस्कार है ।
अक्षय वट के नीचे शय्यादान की भी विधि है । अक्षय वट तीर्थ में अन्न द्वारा विधि पूर्वक श्राद्ध करने वाला अपने पितृगणों को अक्षय एवं सनातन ब्रह्मलोक पहुँचाता है । वट वृक्ष के समीप शाक अथवा जलद्वारा भी यदि एक विप्र को भोजन करा दिया जाय तो उसे कोटि ब्राह्मणों को भोजन कराया हुआ समझना चाहिये –
कृते श्राद्धेऽक्षयवटे अन्नेनैव प्रयत्नतः । पितृन्नयेद् ब्रह्मलोकमक्षयं तु सनातनम् ।।
वटवृक्षसमीपे तु शोकेनाप्युदकेन वा । एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर्भवन्ति भोजिताः।।
(वायुपु0 111/80-81)

वैज्ञानिक युग में भी पितृपक्ष और गया का महत्व

प्राकृतिक सौंदर्य – सुषमा से आच्छादित, सात पर्वत मालाओं से घिरा, निरंजना उद्गमित अन्तः सलिला ‘फल्गु नदी‘ के पष्चिमी छोर पर बसा अति प्राचीन एवं धार्मिक शहर ‘गया‘ भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है । श्राद्ध एवं पिण्डदान के लिये प्रसिद्ध गया वेदों के अनुसार भारत की सप्त प्रमुख पुरियों में अपना एक अलग स्थान रखता है । 

पुराण के अनुसार यह एक मुक्तिप्रद तीर्थ स्थल है । यहॉ प्रत्येक वर्ष भाद्र पक्ष की चतुदर्षी से आष्विन पक्ष की अमावस्या पर सत्तरह दिनों का पितृपक्ष मेला लगता है । इसे पितृपक्ष या पितरों का पक्ष (पखवारा) भी कहा जाता है । इस अवसर पर देष-विदेष के लाखों हिन्दू धर्मावलम्बी अपने पूर्वजों के नाम श्राद्ध, वर्तण एवं पिण्डदान करने के लिये यहॉ आते है । ऐसी मान्यता है कि इस पुण्य क्षेत्र में पिता का श्राद्ध करके पुत्र अपने पितृऋण से हमेषा-हमेषा के लिये उऋण हो जाता है । उनके द्वारा किये गये इस पवित्र कार्य से उनके पूर्वजों की भटकती आत्मा को शान्ति मिलती है । वे प्रेतत्व से मुक्त हो जाते हैं । साथ ही पितरों की प्रसन्नता से श्राद्धकर्ता को भविष्य में धन-धान्य और सुख-समृद्धि व सम्पत्ति की प्राप्ति होती है ।

 इतिहास साक्षी है कभी यहॉ तीन सौ पैंसठ वेदियॉ थी जिस पर हिन्दू तीर्थ यात्रियों द्वारा प्रतिदिन पिण्डदान करने का विधान था । तब उस समय लोगों के पास भी समय सीमा की कोई बाध्यता नहीं थी । पूरी निष्चिंतता एवं इत्मीनान के साथ वे यह कार्य सम्पादित करते थे ।

               परम्परा के यहॉ पिण्डदान करने-कराने का भार यहॉ के गयापाल पंडों के ऊपर रहा है । शास्त्र के अनुसार गया के ये आदि ब्राह्मण श्राद्धकर्म के लिये अत्यंत ही पूज्य माने जाते हैं तथा बिना इनकी उपस्थिति एवं सहायता के यात्रियों को गया श्राद्ध की पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती है । यह गयापाल पण्डे यात्रियों को अपने यहॉ वर्षो पूर्व बने आवासों में ठहराते हैं । बाहर से आने वाले यात्रीगण भी अपनी तत्सम्बन्धी सुविधा को देखते हुए उनके संरक्षण में ही रहना ज्यादा उचित समझते हैं किन्तु वर्षो पुरानी यह परम्परा आज पूरी तरह दम तोड़ने लगी है । यही वजह है कि इन अव्यवस्थाओं के मद्देनजर पिछले तीन-चार वर्षो से स्थानीय प्रषासन ने यह भार स्वयं ही यात्रियों के हित में उठाना शुरु कर दिया है । यहॉ की विभिन्न धर्मषालाओं में भी यात्रियों के ठहरने की उचित व्यवस्था है । यहॉ की इन धर्मषालाओं का भी यत्किचित इतिहास रहा है । इन धर्मषालाओं के निर्माण के पीछे कुछ प्रवासी सेठ साहुकारों का सराहनीय योगदान रहा है । आज भी ये धर्मषालाएॅ उन सेठ-साहुकारों की धार्मिक भावना का अप्रतिम उदाहरण है ।

विष्व प्रसिद्ध विष्णुपद मन्दिर

गया का प्रसिद्ध विष्णुपद मन्दिरस्थापित्य कला का उत्कृष्ट नमूना है, जिसका पुनरोद्धार एवं निर्माण कार्य इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया  था । अहिल्याबाई भारतीय इतिहास की एक अनमोल रत्न थी, जो एक उज्जवल नक्षत्र की तरह आकाष में वर्षो तक चमकती रहेगी । वे गंगा-जमुना की तरह पवित्र और सीता-सावित्री की तरह पूज्य थीं । इनकी गिनती भारत की उन प्रसिद्ध नारियों में की जाती हैं जिन्होंने प्रजा पर नहीं, बल्कि उनके ह्नदय पर एक महान माता के समान वात्सल्यमय शासन किया है । भूरे रंग के पत्थर से निर्मित इस मन्दिर को बनवाने के लिये अहिल्याबाई ने जयपुर के प्रसिद्ध प्रस्तर स्थापित्यकारों को बुलवाया था । इस मन्दिर में भगवान विष्णु के चरण चिह्न हैं ।

श्राद्ध, तर्पण और गया श्राद्ध

कर्मफल सिद्धान्त के अनुसार कुल चौरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ योनि मानी गयी है । मनुष्य योनि पाने के बाद आत्मा का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति ही है । शास्त्रों में जैसा कि उल्लेख है, उसके अनुसार मनुष्य योनि में जन्म लेकर व्यक्ति अगर कोई शुभ सत्कार्य नहीं करता है, तो उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है । तभी तो महात्मा भगीरथ ने जब षिव के जटाजूट में समायी माता गंगा को इस पृथ्वी पर काफी सहजता के साथ उतारा था, तो सृष्टिनियन्ता ब्रह्मा ने उनके निकट आकर उनके द्वारा किये गये इस महत्वपूर्ण कार्य को सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार और उन्हें उपकृत किये जाने की बात स्वीकार की थी लेकिन वहीं उन्होंने यह स्पष्ट निर्देष भी दिया था कि गंगा के उस पवित्र जल से अब वे अपने पूर्वजों का तर्पण भी करें तथी उनकी सार्थकता सिद्ध होगी ।

              वैसे भी हमारे हिन्दू धर्म में जिस प्रकार जीवित मानवों, पशु-पक्षियों तथा लाचार मुनष्यों को जल से तृप्त करने की व्यवस्था है ठीक उसी प्रकार मृतकों की जल-तृप्ति का आधार तर्पण ही है । सनातन धर्मानुयायी लोगों की यह प्रबल इच्छा रहती है कि उनकी सन्तान उनकी मृत्यु के बाद उनका श्राद्ध-तर्पण और पिण्डदान करें । वस्तुतः अत्यन्त श्रद्धा व सद्भव के साथ किये जाने के कारण ही इस कार्य का नाम श्राद्ध पड़ा है । धर्मग्रन्थों में देवता ही उपासना के समान ही पितृकार्य भी सनातन वैदिक जाति का एक अत्यावष्यक कर्तव्य सत्यकर्म है । ऐसा देखा गया है कि दूसरे किसी भी धर्म में तथा दूसरे किसी भी देष में रहने वाले लोग इस प्रकार पितृ कार्य नहीं करते हैं इस सन्दर्भ में महान विचारक मैक्समूलर ने भी सनातन धर्मानुयायी भारतीय जाति की इस अनूठी पद्धति की भूरि-भूरि प्रषंसा की है ।

               शास्त्र सम्मत जो बातें हैं उसके अनुसार जिस प्रकार काषी में व्यक्ति की मृत्यु होने पर से ‘सयुण्य मोक्ष‘ की प्राप्ति होती है ठीक उसी प्रकार गया में मृतात्मा को पिण्डदाननि करने से उन्हें ‘उर्ध्वगति‘ की प्राप्ति होती है ।

               विष्णु पुराण के अनुसार श्राद्धकाल में भक्ति और विनम्र चित्त से उत्तम ब्राह्मण को यथा शक्ति भोजन कराना अनिवार्य माना गया है । असमर्थ होने पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कच्चा अन्न व थोड़ी दक्षिणा भी दे देने से यह क्रिया सार्थक हो जाती है । यदि उसमें भी उसमर्थ हों, तो केवल आठ तिलों से ही श्रद्धांजलि दी जा सकती है । यदि यह भी न हो सके, तो कहीं से गौ का चारा लाकर श्राद्ध और भक्तिपूर्वक गौ को खिला देने से श्राद्ध का फल प्राप्त हो जाता है । उपरोक्त सभी वस्तुओं के अभाव में सिर्फ एकान्त में खड़े होकर श्री सूर्य आदि दिक्पालों से साथ उठाकर अपनी असमर्थता और अपने पितरों के प्रति अगाध श्रद्धा निवेदित कर देने से भी श्राद्ध कर्म सफल मान लिया जाता है ।

पितरों को अक्षय-तृप्ति देती है फल्गु

गया श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान की महत्वपूर्ण स्थली रही है, जिसमें फल्गु नदी (तीर्थ) का अवस्मिरणीय योगदान को नकारा नहीं जा सकता ं किसी भी देष के इतिहास विनिर्माण का प्रकृति प्रदत्त उपहारों के अन्तर्गत प्रथम स्थान पर आसीन नदी का अमूल्य योगदान माना जाता हे ं मानव के आरम्भि क्रिया-कलाप के हजारों वर्षो काएकमात्र प्रमुख सहायक तत्व एक रुप में नदी से जुड़ी लौकिक-अलौकिक कथाएँ प्रायः एकमत से स्वीकार्य हैं । प्राचीन नदी घाटी सभ्यता में प्रारम्भिक मानव बस्तियों का स्थापन और विकास इस तथ्य को सम्पुष्ट करता है । सही अर्थो में किसी भी नगर का महत्व नदी तटों पर अव्यवस्थित होने के कारण अन्य नगरों से द्विगुणितमाना जाता है, ऐसी ही एक विष्वविष्यात नदी (तीर्थ) है – ‘फल्गु‘ ।

मगध के ह्नदय क्षेत्र गया के मध्य भाग में प्रवाहमान फल्गु ने गया के इतिहास को शुरु से ही उसी प्रकार प्रभावित किया है जैसे – गोदावरी ने नासिक को, सरयू ने अयोध्या को, मूसी ने हैदराबाद को, षिप्रा ने उज्जैन को, कावेरी ने कुम्भकोणम् को, मन्दाकिनी ने चित्रकूट को । कई दृष्टि से सर्म्पू भारतीय नदियों में श्रेष्ठ फल्गु नेमगध प्रदेष के इतिहास निर्माण के सहायक तत्व के रुप में शुरु से ही इस धराधाम के कण-कण को प्रभावित किया है, जिसकी परिपार्टी वर्तमान में भी देखी जा सकती है ।

               फल्गु के तट पर बसे होने की वजह से गया का महत्व अपने आप में विषिष्ट और अतुलनीय है ।

               गया के पूर्व में बहने वाली फल्गु के उद्भव के सन्दर्भ में कहा गया है कि ब्रह्माजी द्वारा जगत-कल्याण हेतु इसे स्वर्ग से पृथ्वी पर लाया गया है । ऐसे भगवान विष्णु के दाहिने पैर के अंगूठे से फल्गु का उद्भव भी स्वीकार किया जाता है । जिसे श्रद्धालु भगवान विष्णु की जलमूर्ति मानते हैं । कहा जाता है कि भगवान विष्णु के शरीर का सुगन्ध से ओत-प्रोत है फल्गु नदी इसलिये इसमें स्नान-पूजादि का अपना विषिष्ट महत्व है । फल्गु क कथा जगत-जननी माता सीताजी के गया आगमन से जुड़ी है हुआ यूॅ कि जब श्रीराम, भ्राता लक्षमण व माता सीताजी गया आये, दोनों भाई अपने पिताश्री के पिण्डदान की सामग्री लाने बाजार चले गये । उसी बीच आकाषवाणी हुई थी कि तुरन्त पिण्डदान दो यही शुभ-मूहूर्त है । माता ने पास बहते फल्गु, पास चरती गाय, केतकी, पुष्प और वटवृक्ष को साक्ष्य मानकर अपने ससुर को पिण्डदान कर दिया । पर यह क्या दोनों भाईयों के आने के उपरान्त पूछे जाने पर सिर्फ वटवृक्ष को छोड़कर तीनों ने झूठ बोल दिया इस पर कुपित हो माता सीताजी ने इसे सदैव अन्दर ही अन्दर बहने वाली नदी का श्राप दे दिया और फल्गु अन्तः सलिला हो गयी है । विष्व की इस अनूठी नदी की धार्मिक कथा की उपादेयता चाहे जितनी भी रही हो, भौगोलिक दृष्टि से भी फल्गु अति प्राचीन नदी है जिससे धीरे-धीरे बालू की राषि में वृद्वि होते रहने के कारण जलराषि नीचे चली गयी । यही कारण है आज भी आप जहॉ चाहें कितनी भी गर्मी में ही क्यों नहीं, हाथ से बालू हटाकर जल निकाल सकते है । यह उपरोक्त साक्ष्य यह स्पष्ट करने में पूर्ण सक्षम है कि फल्गु नदी, गया में पिण्डदान का एक फलदायी प्रमुख आधार है, जिसके बिना गया पिण्डदान कर्म असम्भव है ।  

श्री गया माहत्म्य कथा

सूतजी शौनकजी से बोले कि एक समय नारदजी शौनकादि ऋषियों के साथ सनत्कुमार के पास गये और प्रणाम करके पूछा कि हे सनत्कुमारजी ! कोई ऐसे तीर्थ की कथा सुनाइये जो मुक्ति दायक हो जिसका माहात्म्य सुनने से मुक्ति प्राप्त हो, तब सनत्कुमार जी बोले हे नारद/ ऐसा तीर्थ तो गया ही है, ऐसा पवित्र भूमि है कि यहॉ श्राद्ध और पिण्डदान करने से मुक्ति प्राप्त होती है । एक समय गयासुर नामक दैत्य बड़ा बली उत्पन्न हुआ । उसके ऊपर ब्रह्माजी ने धर्मषिला रखकर यज्ञ किया । इस षिला के अचल होने के निमित्त विष्णु भगवान गदाधर नाम से गदा लेकर उपस्थित हुए और सब देवता फल्गु का स्वरुप धारण करके आ विराजे । ब्रह्मा ने यज्ञ करके ब्राह्माणों को गुह रत्न, स्वर्ण आदि दान दिया । तभी से यह पुरी पवित्र हो गयी । यही पितर सदैव वास करते हैं और हर दम यही आषा करते हैं कि हमारे कुल में कोई ऐसा उत्पन्न हो जो यहॉ आकर पिण्ड दे जिससे हम लोगों की मुक्ति हो । गया में पुत्र के जाने और फल्गु नदी में स्पर्ष करने मात्र से पितर लोग स्वर्ग लोक चले जाते हैं । गया क्षेत्र में में अपने निमित्त बिना तिल का पिण्डदान देने से ब्रह्महत्या, सुरा-पान इत्यादि घोर पापों से मुक्ति मिलती है । गया में जान-पहचान वाले मृत मनुष्य का नाम लेकर पिण्डदान देने से उसकी भी मुक्ति होती है । गया में पिण्डदान करने से कोटि तीर्थ और अष्वमेध यज्ञादि का फल मिलता है । गया में श्राद्ध करने वाले को किसी काल का विचार नहीं करना चाहिये । गया में मृत्यु होने से मुक्ति होती है क्यों कि यहयभी सव्तपुरी में से एक पुरी है । गया में ब्राह्मण भोजन कराने से पितर लोगों को तृप्ति मिलती है । गया में मुण्डन कराने से सकुल बैकुण्ठ को जाते है । गया में जाकर विष्णु की भगवान (गदाधर) का स्मरण कर पितरों का आह्मन कर श्रद्धायुक्त होकर श्राद्ध करें । गया में श्राद्ध करते देखकर पितर कहीं भी होने पर झट गया में पहुॅच जाते है । गया में पिण्डदान करने के निमित जाकर काम, क्रोध को त्याग देवें । गया क्षेत्र में सब जग तीर्थ विराजमान हैं । इससे गया क्षेत्र सब तीर्थे से श्रेष्ठ सब जगह तीर्थ विराजमान हैं । इससे गया क्षेत्र सब तीर्थो से श्रेष्ठ गिना जाता है । जो मनुष्य मीन, मेष, कन्या, धनु, कुम्भ, मकर में सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण में तथा सोमवती अमावस्या को पिण्डदान करता है उसको महान पुण्य होता है । जिसमें कन्या के सूर्य में पिण्डदान करने का बड़ा माहात्म्य है ।

इतनी कथा सुन नारदजी श्री सनत्कुमार से बोले – हे महाराज ! कृपाकर गयासुर की उत्पत्ति का वृतान्त मुझसे कहिये, ऐसा विचित्र कैसे हुआ कि उस पर स्वयं ब्रह्म ने यज्ञ किया ? प्रष्न को सुनकर सनत्कार बोले – हे नारद ! एक समय स्वयं ब्रह्माजी सृष्टि रचते समय गयासुर को उत्पन्न किया, उसने कोलाहल पर्वत पर जाकर घोर तपस्या किया और बहुत दिनों तक श्वास रोक कर खड़ा रहा । उसकी ऐसी तपस्या देखकर इन्द्र घबराये कि कहीं मेरा सिंहासन न ले ले । ऐसा विचार कर सब देवताओं को ले ब्रह्मा के पास गये और सब वृतान्त कहा । ब्रह्म बोले, अच्छा चलो षिवजी से राय लेना चाहिये । तब सब षिवजी के पास गये । महादेवजी ने सब देवताओं को साथ लिया और विष्णु के पास गये और प्रणाम कर स्तुति की । तब विष्णु भगवान ने सब देवताओं से पूछा कि हे देवता लोग ! आप सब किस कारण यहॉ आये हैं ? तब सब देवता बोले – हे नारायण । गयासुर नामक एक भारी दैत्य उत्पन्न हुआ और उसने घोर तपस्या की । सो हे नाथ ! वरदान देकर हम सबकी रक्षा कीजिये । तब विष्णु भगवान बोले – तुम लोग उसके पास चलो, मैं गरुड़ पर चढ़कर वहॉ आता हूॅ । सब देवताओं के चले जाने के बाद विष्णु भगवान गरुड़ पर चढ़कर गयासुर के पास आये और शंख से उसका शरीर स्पर्ष कर बोले हे दैत्यराज ! तुम्हारी उग्र तपस्या देखकर हम अति प्रसन्न हैं और तुम्हें वरदान देने के लिये आये हैं, वर मॉगों । यह सुनकर गयासुर बोला – हे प्रभु ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और वर देने आये हैं तो कृपा कर वर दीजिये कि मेरे स्पर्ष से यावत सुर, असुर, कीट, पतंग, पापी, ऋषि, मुनि, प्रेत यह सभी पवित्र होकर मुक्ति को प्राप्त होवें । उसके वरदान को सुनकर विष्णु भगवान एवमस्तु कहकर सब देवता सहित निज आश्रम को चले गये । उसी दिन से गयासुर के दर्षन और स्पर्ष से सभी जीव मुक्ति प्राप्त कर बैकुण्ठ को जाने लगे । धीरे-धरे यमपुरी जनषून्य हो गयी । तब यमराज इन्द्रादि देव सहित ब्रह्म को लेकर विष्णु भगवान के पास आये और बोले हे दीबन्धु ! गयासुर के स्पर्ष से सब बैकुण्ठ को चले गये और यमपुरी जन षुन्य हो गयी । यमराज की ऐसी विनती सुन विष्णु की आज्ञा पा ब्रह्माजी जब गयासुर के पास गये तब असुर प्रणाम करके बोला – हेप्रभु ! आप मेरे समीप किसलिये आये हैं कृपाकर कहिये, तब ब्रह्मा ने कहा, हे दैत्यराज ! मैं तमाम पृथ्वी पर घूम आया और मुझे यज्ञ करने के लिये निमित्त कोई भी पवित्र स्थान न मिला, इस वास्ते मैं तेरे पास आया हूॅ कि तेरा शरीर नारायण के वरदान से पवित्र है, सो अपना शरीर मुझे यज्ञ के हेतु दो । ब्रह्माजी का ऐसा वचन सुनकर गयासुर अति हर्ष से बोला हे नाथ ! आप ही लोगों की कृपा से यह मेरा अधर्म शरीर पवित्र हुआ है सो आप इस पर यज्ञ अवष्य करिये जिससे यह और भी पवित्र हो जाये ।

               सनत्कुमार बोले – हे नारद ! उसी समय गयासुर उत्तर दिषा की तरफ सिर करके लेट गया, तब ब्रह्मा ने सम्पूर्ण ऋषि और मुनि को बुलाकर गयासुर के ऊपर यज्ञारम्भ किया, यज्ञ से छुटकारा न मिलेगा और न गया जाकर पिण्डदान करेंगे, उन लोगों के पितरों का क्या हाल होगा जो गया क्षेत्र में अपने पुत्र के आने का बाट जोहते रहते हैं और दूसरों के पिण्ड देखकर तरसते रहते हैं । ऐसा वचन सुनकर श्री वषिष्ठ मुनि सब ऋषि-मुनियों के साथ अयोध्या भगवान रामचन्द्र जी के पास चले ।

श्री सनत्कुमार जी बोले – हे नारद ! साठ हजार ऋषि-मुनियों को लेकर श्री वषिष्ठ जी भगवानराचन्द्रजी के नगर अयोध्या में आये । भगवानश्री रामचन्द्र जी समस्त ऋषि-मुनियों को नमस्कार करते हुए ह्नदय से स्वागत किया तथा अत्यन्त सुन्दर स्थान में सबकों ठहराया । भगवान रामचन्द्र जी समस्त ऋषि-मुनियों की सेवा सत्कार करने के लिये सैकड़ों दूत नियुक्त किये और नाना प्रकार के (छप्पन प्रकार के ) मेवा मिष्ठान युक्त उत्तम भोजन बनवाकर सभी को भोजन करवाया । भोजन के उपरान्त श्री वषिष्ठ जी ने भगवान रामचन्द्र जी से कहा – हे रामचन्द्र जी ! आप अपने पितरों को प्रेत बाधाओं से मुक्त कराने के लिये और उनकों स्वर्गलोक गमन करने के लिये गया में पितरों के निमित्त श्राद्धादि पिण्ड दान  करें । हमारी हार्दिक इच्छा यही है कि आप इस कर्म को करने में देर न करे ।

श्री सनत्कुमार जी बोले – हे नारद ! गुरु वषिष्ठ जी की आज्ञा पालन करने के लिये भगवान रामचन्द्र जी तुरन्त प्रतिज्ञा की और कहा – हे नाथ ! इस कर्म (श्राद्धदि पिण्डदान) को गया जाकर शीघ्र करुँगा । इतना वचन कहकर श्री रामचन्द्र जीग ुरु वषिष्ठ सहित समस्त ऋषि-मुनियों को मुँह मांगा दान-दक्षिणा देकर विदा किया और गया चलने को तैयार हुए । एक दिन भगवान रामचन्द्र जी अपने भाई लक्ष्मण जी और सीता जी को साथ लेकर गया क्षेत्र में पधारे और सर्व प्रथम मुण्डन कराकर फल्गु सरिता में स्नान किया और विधि पूर्वक अपने कुल पितरो (पिता, पितामह आदि) को स्वर्गलोक के निमित्त गया क्षेत्र के वेदियों पर जाकर प्रेमपूर्वक श्राद्धादिक पिण्डदान करने लगे । श्री सनन्कुमार जी बोले – हे नारद ! जब रामचन्द्र जी रुद्रपद पर पिण्ड देने लगे तो दषरथ जी ने पिण्ड लेने के लिये दोनों हाथ फैलाये । रामचन्द्र जी से कहा कि हे पुत्र ! तुम मेरे हाथ में न पिण्ड देते तो मुझे स्वर्ग न मिलता । यह कहकर दषरथ जी बहुत प्रसन्न होकर रुद्र लोक को चले गये । इसके बाद भगवान रामचन्द्र जी के इक्कीस कुल स्वर्गलोक को पहुँच गये । यह गया महात्म्य जो मनुष्य पढ़ेंगे किसी दूसरे को सुनावेंगे उनको भी गया श्राद्ध का फल मिलेगा और अन्त में वे भी विष्णु लोक पहुँचेंगे ।

श्री सनत्कुमार जी बोले – हे नारद ! एक समय षिव जी पार्वती के साथ परिजात वन में विहार कर रहे थे । वहॉ धर्मव्रता के स्वामी मरीचि ऋषि फूल लाने को गये । षिव जी इनको इतनी कथा कह चुकने पर नारदजी ने सनत्कुमार से पुनः प्रष्न किया कि जो षिला गयासुर के ऊपर रखी गयी है वह धर्मराज के घर कैसे गयी ? इसका वृतान्त कृपा पूर्वक कहिये । यह सुन सनत्कुमार बोले – हे नारद ! यह षिला धर्मराज की पुत्री थी, पूर्वकाल में विष्वरुप नाम स्त्री से धर्मराज के घर एक कन्या उत्पन्न हुई, जब वह विवाह के योग्य हुई तब धर्मराज ने योग्य वर ढूँढ़ा परन्तु कोई उत्तम वर न मिला । तो कन्या को आज्ञा दी कि तुम स्वयं वर प्राप्ति के निमित्त तपस्या करो । पिता की आज्ञा पाकर धर्मव्रता पति के लिये वन में घोर तप करने लगी । तपकरती कन्या को मरीचि ने देखा और उससे पूछा – तू कौन है और ऐसा घोर तप क्यों करती है ? मरीचि का वाक्य सुन धर्मव्रता बोली – मैं धर्मव्रता धर्मराज की कन्या हूँ और पति के निमित्त वन में तप करती हूॅ । उसका ऐसा उत्तर सुन मरीचि बोले – हे सुन्दरी/ मैं ब्रह्मा का मानस पुत्र हूॅ और मैं भी एक अच्छी स्त्री से विवाह करने के निमित्त घूम रहा हूॅ सो परमेष्वर की कृपा से हमारा और तेरा संयोग आ मिला है, सो तू मुझसे विवाह कर ले । यह सुन धर्मव्रता बोली की आप मेरे पिता धर्मराज के पास जाइये । यह सुन -मरीचि धर्मराज के पास गये । मरीचि को धर्मराज ने अर्धपाद्य दे सन्तुष्ट किया मरीचि बोले – हे धर्मराज/ हम विवाह हेतु तमाम पृथ्वी पर घूम आये, मगर आपकी कन्या ही इस योग्य हमें मिली । इसलिये आप उस कन्या को हमें देकर हमारा मनोरथ पूर्ण कीजिए । धर्मराज ने मरीचि की बात स्वीकार कर ली और कन्या को बुलाकर विधिपूर्वक उसके साथ विवाह कर दिया । मरीचि उस स्त्री को लेकर निज आश्रम को आये और आनन्दपूर्वक रहने लगे ।

               इतना कथा सुन नारद ने सनत्कुमार से पूछा- है मुनि! मरीचि ने धर्मव्रता को क्यों श्राप दिया? सनत्कुमार बोले कि हे नारद! कुछ काल के उपरान्त मरीचि कहीं से थके आये और स्त्री से बोले मैं थक गया हूॅ मैं शयन करता हूॅ, तू मेरा चरण दबा । धर्मव्रता मरीचि की आज्ञानुसार पॉव दबाने लगी और मरीचि सो  गये । अभी कुछ ही समय बीता था कि मरीचि के पिता ब्रह्मा वहॉ आ उपस्थित हुए । तब धर्मव्रता बड़े संकट में पड़ी और विचार करने लगी कि मैं किसकी सेवा करुँ । इधर पति की आज्ञा भंग होती है उधर ससुर का अपमान होता है । यह सोचकर धर्मव्रता ने ब्रह्मा की सेवा करना ही उत्तम समझा और पति की सेवा छोड़ ब्रह्मा का सम्मान करने लगी । उसी समय मरीचि जागे और स्त्री को समीप न देषकर क्रोध में आकर श्राप दिया – मेरी आज्ञा को तूने भंग किया है उससे तू षिला हो जा । यह श्राप सुनकर धर्मव्रता बोली- हे पति आपके सो जाने के बाद ब्रह्माजी आये आपने मुझ निरपराध को श्राप दिया, इससे मैं भी आपको श्राप देती हूॅ कि महादेवजी से आपको श्राप मिले। श्राप-देकर धर्मव्रता जाकर गार्हपत्य विधि से तप करने लगी और मरीचि भी श्राप पाकर तप करने लगे ।  धर्मव्रता के तप से इन्द्रादिक देवता घबराकर नारायण के पास गये और बोले-हे प्रभो! धर्मव्रता के तपोतेज से हम लोग व्याकुल हो रहे हैं, रक्षा कीजिये । यह सुन विष्णु भगवान धर्मव्रता के पास जा बोले – तेरे तप से प्रसन्न हूॅ, वर मांगो । तब धर्मव्रता बोली, मैं पति के श्राप से मुक्त हो जाऊँ । यह सुन भगवान बोले-हे सुव्रते! परम ऋषि के दिये श्राप को नहीं छुड़ा सकता, तुम ऐसा वरदान मांगों कि जिससे संसार की मर्यादा बनी रहे । तब धर्मव्रता बोली-आप यह वरदान दीजिये कि मैं अति पवित्र षिला गिनी जाऊँ और मुझ पर सम्पूर्ण देवता और तीर्थो का वास हो, जिससे मनुष्य स्नान-दान करने से पितरों को मुक्त कर सके और जो कोई मनुष्य या पषु-पक्षी शरीर त्याग वह बैकुण्ठ जाए ओर मेरे ऊपर कोई कर्म करे वह अक्षय हो । धर्मव्रता के वचन को सुनकर सभी देवताओं सहित विष्णु भगवान ने ‘एवमस्तु‘ कह वरदान दिया और कहा-जिस समय तू गयासुर के सिर पर रखी जायेगी उस समय हम लोग तुम पर स्थित होंगे । यह वरदान देकर सब देवता विष्णु सहित निज स्थान को चले गये ।

               इतनी कथा कहकर सनत्कुमार बोले – हे नारद! अब मैं तुमसे इस षिला के महात्म्य का वर्णन करता हूॅ । जब वरदान पाकर षिला अति पवित्र हो गयी तब उसके स्पर्ष और दर्षन मात्र से जीवों की मुक्ति होने लगी और यमपुरी खाली हो यगी । तब घबराकर यमराज ब्रह्मलोक में गये और बोले-महाराज आप अपना अधिकार ले लीजिये क्योंकि धर्मव्रता के माहात्म्य से अब यमपुरी में कोई काम नहीं रहा है । इस प्रकार खाली कब तग बैठे रहें या कृपाकर कोई उपाय बतलायें । तब ब्रह्माजी बोले – हे यमराज/ तुम षिला को उठाकर अपने घर में रख दो । ब्रह्मा की आज्ञा पाकर यमराज षिला को उठाकर अपने घर में रख दिया । यह षिला फिर गयासुर पर रखी गयी तब से सब पितरों को मोक्ष मिलने लगा । षिला रखने के कारण गयासुर के सिर और पीठ का नाम मुण्ड-पृष्ठा पड़ा । इस षिला को प्रभात पर्वत ने ढँक लिया, फिर सूर्य नारायण ने प्रकट किया । इसी से प्रभात नाम प्ड़ा । षिला में छेद करने पर एक अॅगूठा निकाला, इसलिये इस स्थान को प्रेत षिला कहते हैं । जिस स्थान पर रामचन्द्रजी ने स्थान किया था उसका नाम रामतीर्थ कहा जाता है । रामतीर्थ में स्नान और पिण्डदान करने से पितर यदि प्रेत भी हुए हों तो विष्णु-लोक में जाते है ।

               इतना सुन नारद ने सनत्कुमार से पूछा-हे मुनि! यह बतलायें कि गया क्षेत्र में किस प्रकार गदाधर भगवान अव्यक्त स्वरुप में स्थित हैं और गदाधर नाम कैसे हुआ? इतना वृतान्त कहिये । सनत्कुमार बोले हे -नारद! किसी समय गदा नाम का एक असुर उत्पन्न हुआ था जिसके वज्रतुल्य हड्डी से विष्वकर्मा ने गदा बनाकर स्वर्ग में रखा था । कुछ काल उपरान्त ब्रह्मा का पुत्र होत्र नामक राक्षक उत्पन्न हुआ । उसने वायु भक्षण करके सौ हजार वर्ष तक एक अँगूठे पर खड़ा होकर घोर तपस्या की । उसकी घोर तपस्या देख सब देवता वर देने को आये । दैत्य ने वर मांगा – मैं देवता, दैत्य, मनुष्य, विष्णु, षिव, इन्द्र, ब्रह्म इत्यादि चक्र द्वारा न मारा जाऊँ। वरदान प्राप्त करने के बाद इन्द्र से युद्ध करके जीत लिया और स्वयं इन्द्र बन बैठा । उस समय सब देवता भयभीत होकर नारायण के पास गये और प्रार्थना करे बोले – हे प्रभु! ळम लोगों को कोई ऐसा शस्त्र दीजिये जिससे हम लोग दैत्य को मार सकें । तब नारायण बोले हे भाई! मेरे शस्त्र से उसका वध नहीं हो सकता है । उसी समय विष्वकर्मा ने वह गदा लाकर भगवान को दिया । उस गदा को धारण करने से गदाधर कहलाये इसी से आदि गदाधर नाम पड़ा । गयाजी में नदी, नद, पर्वत देवता यावत हैं, सब व्यक्त रुप से गदाधर है ।

               हे नारद/ जब विष्णु भगवान गदा को धारण करके षिला पर स्थित हुए उस समय ब्रह्म ने बहुत स्तुति की, तब विष्णु भगवान ने ब्रह्म से कहा वर माँगों, मैं बड़ा प्रसन्न हूँ । तब ब्रह्माजी बोले – हे प्रभु! आप इस षिला पर निरन्तर वास करें । भगवान एवमस्तु कहकर बोले ब्रह्माजी ! जो पुरुष यहॉ आकर मेरा दर्षन पूजन करेगा व बड़े आयुष्य को भोगेगा और उसकी कीर्ति प्रसिद्ध होगी और पौत्रादिक के सुख का भोग करेगा । यहॉ पिण्डदान करने से पितर स्वर्गलोक को जाते हैं और पिण्डदान करने वाले बैकुण्ठ को जाता है । इसके बाद महोदव ने नारायण की स्तुति की । तब गदाधर भगवान षिला के मण्ड-पृष्ठ पर स्थित   हुए । इतनी कथा कहकर सनत्कुमार बोले हे नारद ! इस माहात्म्य को जो सुनेगा वह यथायोग्य मनोरथ प्राप्त करेगा और स्वर्ग को जायेगा ।

               इतना कह सनत्कुमार बोले- हे नारद! अब मैं गया की यात्रा करने वालों के लिये जो कार्य है वह कहता हूॅ । प्रथम घर पर मुण्डल कराकर अपने घर की प्रदक्षिणा कर ब्रह्मचर्य होकर गया को जायें । ऐसा करने वाले को पद-पद पर अष्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है । गया में जाकर पूर्व तरफ की नदी में प्रथम स्नान कर देव पितृतर्पण और श्राद्ध कर दूसरे दिन प्रेत पर्वत पर जाकर स्नान कर, तिल युक्त पितरों निमित्त पिण्डदान करं । जब पितर को पिण्ड दिया जाता है उसे राक्षस खाने के वास्ते आते हैं । इसी वास्ते उसे तिलयुक्त दान करना चाहिये । जितने तिल पिण्ड के साथ खर्च हो हैं उतने ही असुर भयभीत होकर भागते हैं । पिण्डदान करने वक्त प्रत्येक मृत मनुष्य का नाम लेता जायें । इस रीति से पिण्डदान करने से सौ कुल का उद्धार होता है ।

               सनत्कुमार बोले-हे नारद! पुनीत गया क्षेत्र में अति पवित्र उत्तर मानस है वहॉ विधि पूर्वक स्नान कर श्राद्ध, तर्पण करके सूर्य भगवान का पूजन कर वहॉ से मौन धारण करके दक्षिण मानस सरोवरी को जायें, वहॉ पर तीन तीर्थ हैं । उन तीनों में विधि पूर्वक स्नान करके अलग-अलग श्राद्ध करें, फिर उत्तर दिषा में मुक्ति देने वाला उदीची तीर्थ है । वहॉ पर स्नान से मनुष्य स्वर्ग को जाता है । वहॉ पर कनखल में स्नान करें, जिसके दक्षिण मानसरोवर में स्नानकर सूर्य नारायण को अर्घ देकर पूजन करें और स्तुति करें, नमस्कार करें, इसी प्रकार मैनाक फल्गु तीर्थ में स्नान करें, पितृ के मुक्ति वास्ते मुख्य तीर्थ फल्गु है । फल्गु तीर्थ में स्नान करने से सम्पूर्ण तीथों के स्नान का पुण्य प्राप्त होता है । लाख अष्वमेध यज्ञ करने के बराबर फल्गु तीर्थ के स्नान का फल है । फल्गु तीर्थ में स्नान करके गदाधर भगवान का पूजन करने से मनुष्य के इक्कीस कुल तर जाते है । वहॉ पंच तीर्थ में स्नान करने से पितर को ब्रह्मलोक प्राप्त होता है । वहॉ पर जो मनुष्य विष्णु भगवान का पंचामृत धूप, नैवेद्य, वस्त्र से पूजन करता है । उसको फल प्राप्त होता है । गया के सब तीर्थो में फल्गु सबसे श्रेष्ठ है । यहॉ का श्राद्ध अक्षय होकर पितर को मुक्त कर देता   है । धर्मारण्य तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है । मातंग तीर्थ जो पितरों को मुक्त करने वाला है उसी स्थान पर कूप के अन्य तीर्थ है । वटेष्वर का नाम लेकर पितरों के मुक्ति के लिये नमस्कार कर प्रार्थना करें कि मेरे कुल में जो अधोगति को प्राप्त हाआ हो वह मुक्ति को प्राप्त हो । ब्रह्मासिर पर शास्त्रोक्त विधि से पितर का श्राद्ध करें । कूप के मध्य पिण्डदान करने से पितर को ब्रह्मलोक प्राप्त होता है । उसी कूप को ब्रह्माजी ने गया में स्थित किया है । यहॉ श्राद्ध करने के उपरान्त ब्र्रह्मा की स्तुति करें, और कहें कि हे ब्रह्मदेव ! हमारे पितरों को मोक्ष मिले । आगे गौ प्रचार के निकट ब्रह्माजी का लगाया आम्रवृक्ष है उसको नमस्कार करके जल से सींचे । हे नारद! एक मुनि ने उसी आम्रवृक्ष के नीचे वगैर जाने सन्ध्या किया था जिसके प्रभाव से उसके पितृ मुक्त हो गये, तभी से आम्रवृक्ष का ऐसा माहात्म्य हो गया है ।

               हे नारद! फल्गु में स्नान कर गया सिर पर पिण्डदान करें । यह तीर्थ तीनों दिन के किये हुए स्नानों से श्रेष्ठ गिना जाता है । यहॉ पर श्राद्ध करना अक्षय होता है । मुण्डपृष्ठा तीर्थ के नीचे फल्गु तीर्थ है जहॉ गदाधर भगवान व्यक्त रुप से स्थिर हैं । यहॉ पर श्राद्ध दर्षन-पूजन करने से पितरों को मुक्ति और पिण्ड करने से सम्पूर्ण पापों का नाष होता है । विष्णुपद में श्राद्ध करने से एक हजार कुल को स्वर्ग मिलता है । रुद्रपद पर श्राद्ध करने से एक हजार कैलाष प्राप्त होता है । ब्रह्मपद पर श्राद्ध करने से पितरों को वाजपेय, राजसूर्य, अष्वमेध ज्योतिष्ठाम यज्ञ का फल प्राप्त होता है, जो मात्र गार्हपत्याग्निपद, शुक्तपद, नारदपद, अगस्त्यपद, क्रौचपद, मतंगपद पर पिण्ड करते हैं उनके पितरों को इन्द्रलोक प्राप्त होता है ।

               इतना कहकर सनत्कुमार बोले-हे नारद! जब गया के राजा ने गयाजी में यज्ञ किया और अन्न-दूध इतना दान किया कि अन्न के ढेर से सैकड़ों पर्वत जैसा प्रतीत होने लगे और

द्रव्य का बड़ा भारी पर्वत जैसा हो गया, उसके यज्ञ से विष्णु आदि देवता प्रसन्न होकर वरदान देने को आये, तब राजा ने यह वरदान मांगा कि ब्रह्मा से गया के ब्राह्मणों को जो श्राप मिला है वह श्राप इन लोगों का छूट जाय और यह लोग यज्ञ में पूजित हों और यह पुरी गया नाम से प्रसिद्ध हो । (तब से इस पुरी का नाम गया पड़ा) यह सुन सब देवता सहित विष्णु एवमस्तु कहकर अन्तर्ध्यान हो गये ।

               इतना कहकर सनत्कुमार जी बोले- हे नारद! एक प्रेत से अपनी मुक्ति के लिये किसी बनिये से कहा कि हमारा अमुक स्थान में धन गड़ा हुआ है, उसे खोद कर ग्यारह भागों को ले लो, बाकी पाँच भागों से हमारा गया में जाकर पिण्ड कर दो । बनिये ने वैसा ही किया, उससे वह प्रेत योनि से मुक्त हो गया । इसी से गयाजी में जो तीर्थ हैं, वह पितरों को मोक्ष देने वाले हैं । गया में यम द्वार पर वैतरणी नदी है उसके पार होने के लिये एक गऊ दान करना चाहिये ।

               वहीं जन्मान्तर दैत्य षिरोमणि विरोचन का पुत्र चक्रवर्ती नाम से सुप्रसिद्ध है, ऐसे पुरातन महर्षि वेद व्यास से विदित होता है । भृगुऋषि ने कुछ क्षेत्र में सौ अष्वमेध यज्ञ किया । अष्वमेध यज्ञ करने से इन्द्र का स्थान मिलता है । दैत्य गुरु शुक्राचार्य की कृपा से परम शूर हो गये । तपस्या से और गुरु की कृपा से त्रैलोक्य का राज्य सम्पादन किया । सब देव श्री ब्रह्माजी सहित भगवान के शरण में गये । तब श्री हरि ने कष्यप ऋषि से अनिति नामक देवता में अवतार लिया । बटु रुप धारण करे वामन-रुपी परमात्मा यज्ञ स्थान में आ गये । चक्रवर्ती बलि से तीन पग भूमि याचना किये । तपस्वी ब्रह्मचारी देखकर परम सन्तुष्ट होकर सद्पात्र को सर्वस्व दान करने की इच्छा हो गयी और दान दिया । भक्त कल्पदु्रम श्रीहरि त्रिक्रिवम रुप धारण करके एक पग से भूमि दूसरे से अन्तरिक्ष आक्रमण करके तीसरे पग का स्थान कहॉ है ? ऐसे पूछने पर कहा-हे भगवान! मेरे सिर पर चरण-कमल रखो ऐसा प्रार्थना किया । भक्त षिरोमणि चक्रवर्ती बलि राजा के सर्वस्व दान देने से सुप्रसन्न होकर भगवान भक्त वत्सल प्रभु उसके द्वारपाल हुए और उसके सब मनोरक्ष पूर्ण किये ।

श्री सनत्कुमार जी बोले – हे नारद! गया श्राद्ध करने से पहले श्राद्ध करने वाले को चाहिये कि सबसे पहले पुनपुन नदी में मुण्डल कराकर वहीं पिण्डदान करें, उसके बाद गया श्राद्ध करें । पुनपुन में श्राद्धादि पिण्डदान करने से पितरों का उद्धार होता है और अन्त में उसके पितृ बैकुण्ठ वास करते हैं इतना सुनकर नारद ने कहा – हे सनत्कुमार जी ! कृपाकर यह बतायें कि पुनपुन नदी इतनी अति पवित्र कैसे हो गयी जो सर्वप्रथम वहीं पिण्डदान करे तब गया श्राद्ध करें ।

नारद जी के वचन सुनकर श्री सनत्कुमार जी हँसते हुए कहा – एक समय आदि गंगा (पुनपुन नदी) के पास पुनपुनियाँ नाम की एक वेष्या रहती थी । वह वेष्या एक दिन सन्ध्या समय स्नान करके अपने घर लौट रही थी, रास्ते में भगवद् कथा हो रही थी । वेष्या वहीं बैठकर कथा सुनने लगी । जब कथा समाप्त हो गयी तब वेष्या हाथ जोड़कर कथावाचक से बोली-हे महाराज! मैंने अपने जीवन में अनेकों पाप किया है अब मुझकों मुक्ति का मार्ग बतायें जिससे मेरा उद्धार हो । वेष्या के वचन सुनकर कथावाचक ने कहा-हे माता! तुम्हारे सब पाप उसी समय नष्ट हो गये जिस समय तुम्हें ऐसा ज्ञान हुआ । हाँ, एक बात सुनो तुमने जीवन में जितना लिप्त पाप कर्म में हुई अगर तू उतना ही लिप्त ईष्वर भक्ति में कर, तो तेरा उद्धार निष्चय है । कथावाचक के वचन सुनकर वेष्या प्रसन्न हुई और तुरन्त उसी जगह आसन जमाकर ईष्वर प्राप्ति के लिये कठिन तपस्या शुरु की । जब बहुत वर्ष बीत गये तब भगवान विष्णु प्रकट होकर बोले कि वर मांग । तब वेष्या ने कहा- हे प्रभु! मैं यही मांगती हूॅ कि हमारे शरीर के स्पर्ष से जितने मनुष्य पापी हुए उससे भी अधिक मनुष्य हमारे ही स्पर्ष से बैकुण्ठ वास करें । इस पर भगवान बोले अच्छा आज से यह आदि गंगा नदी तेरे नाम से विख्यात होगी । जो मनुष्य इसमें स्नान-ध्यान, तर्पण, श्राद्धादिक पिण्डदान करे वे लोग पितरों के सहित बैकुण्ठ वास करेंगे । वेष्या ने तुरन्त उसी नदी में अपना शरीर छोड़ दिया और बैकुण्ठ को चली गयी ।

श्री सनत्कुमार जी बोले – हे नारद! गया क्षेत्र इतनी पवित्र भूमि है जिसका वर्ण करना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है । गया क्षेत्र के बारे में एक बात मैं कहता हूॅ तो सुनों । हे नारद! उस समय नर्मदा, नदी के तट पर समस्त ऋषि मुनियों का सत्संग हुआ, उस सत्संग में सारे संसार (विष्व) के समस्त ऋषि-मुनि एकत्र हुए थे । सो हे नारद! उस सत्संग में निषिदिन (नित्य) धर्म कथाओं की चर्चायें हुआ करती थीं । जब कभी मुझको वहॉ की सत्संग के बारे में याद आ जाती है तो मेरा सारा शरीर प्रफुल्लित हो जाता है, मेरा आत्मबल बढ़ जाता है ‘तबीयत भी प्रसन्न हो जाती है । यानी सारा अंग पवित्र हो जाता है है । हे नारद! मैं आज तक यह बात किसी से कभी नहीं कहा, न मैंने वहॉ के बारे में किसी को कुछ बात बताया । यह बात मैं सिर्फ (केवल) तुम्हीं से आज कह रहा हूॅ सो ध्यान पूर्वक सुनो ।

               श्री सनत्कुमार जी बोले – हे नारद! उस सत्संग में एक दिन गया क्षेत्र के वाद-विवाद को सुनकर श्री दुर्वासा मुनि ने कहा- हे मुनियों! गया क्षेत्र के बारे में जो चर्चायें छिड़ी हैं और गया क्षेत्र के बारे में नाना प्रकार के वाद-विवाद हुए, आप लोग गया क्षेत्र के बारे में बहुत-सी उपमायें देकर अनेकों प्रकार के पाप कर्म से मुक्ति की रहा (मार्ग) बतायी । गया क्षेत्र की पवित्रता तथा गया की महात्म्य के बारे में अनेकों प्रकार के उदाहरण युक्त कथा सुनायी । हे मुनियों! आप लोगों ने अभी कहा कि गया में पितरों को यम के कष्ट से छुटकारा दिलाने के लिये गया, पितरों के निमित्त श्राद्धादिक पिण्डदान करना बहुत जरुरी है । इससे पितर स्वर्ग को जाते हैं ।

               जो मनुष्य गया में जाकर सर्वप्रथम मुण्डन कराकर फल्गु नदी में स्नान करके श्राद्धादि पिण्डदान करता है । सात पीढ़ियों का उद्धार करता है ब्रह्म योनि में पिण्ड करने से पित्रों को स्वर्ग मिलता है । प्रेत योनि में पिण्ड देने से प्रेत बाधाओं से मुक्ति मिलती है यानि गया ऐसी पवित्र भूमि है कि सिर्फ गया में पहुँच जाने से ही पितरों को कष्ट से छुटकारा मिलने लगता है ।

               श्री सनत्कुमार जी बोले-हे नारद! दुर्वासा मुनि ने कहा कि हे मुनियों! यह बात सुनकर मुझे शंका होती है कि जब गया इतनी पवित्र भूमि है और गया में आकर श्राद्धादिक पिण्डदान करने से अपने और पितरों को मुक्ति मिलती है तो बताइये हे मुनियों! मनुष्यों में श्रेष्ठ (त्रेता युग में भगवान श्री विष्णु के अवतार) मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी अपने पिता राजा दषरथ जी का अपने हाथों से गया जाकर कभी श्राद्धादि पिण्डदान किया या नहीं सो यह बात मुझे आप लोगों से स्पष्ट रुप से नहीं बतायी सो कृपाकर यह बताने का कष्ट करें जिससे हमारी आत्मा को सन्तुष्टि हो सके और हमारी शंका दूर हो जाये ।

श्री सनत्कुमार जी बोले-हे नारद! श्री दुर्वासा मुनि के मुख से ऐसा वचन सुनकर सारे ऋषियों-मुनियों में सन्नाटा छा गया और सभी ऋषि-मुनि अपने-आप मन में सोचने लगे कि दुर्वासा मुनि का कहना ठीक है, उनका प्रष्न भी पूर्ण होना चाहिये । सो हे नारद! अगस्त मुनि तुरन्त अंगीरा, वायु, सबिता आदि ऋषियों के साथ श्री वषिष्ठ मुनि के पास जाकर श्री दुर्वासा मुनि का प्रष्न दुहराया, तब वषिष्ठ मुनि ने हँसते हुए कहा- हे प्रिय मुनियों! आप लोगों का प्रष्न सुनकर हमारी आत्मा बहुत प्रसन्न हुई मैं तो बहुत दिन से भगवान श्री रामचन्द्र जी से गया जाकर अपने पितरों के निमित्त श्राद्धादिक पिण्डदान करने के लिये कहने वाला था पर उनकों अयोध्या (अवध) के राज्य-कार्य में बहुत व्यस्त रहने के कारण नहीं कह सका क्योंकि अभी कुछ ही दिन हुए है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी लंका पर विजय प्राप्त करके लौटे हैं, सो हे नारद! वषिष्ठ जी के वचन काटते हुए मुनियों ने कहा- हे वषिष्ठ जी ! यदि भगवान रामचन्द्र जी काम-धाम में व्यस्त रहने के कारण अपने पितरों का श्राद्धिदि पिण्डदान करने में देर करते हैं तो इसका प्रभाव देष के समस्त लोगों पर पडेगा और सभी लोग अपने-अपने काम-धाम में लगे रहेंगे, जीवन भर कभी भी किसी मनुष्य को काम से छुटकारा न मिलेगा और न गया जाकर पिण्डदान करेंगे, उन लोगों के पितरों का क्या हाल होगा जो गया क्षेत्र में अपने पुत्र के आने का बाट जोहते रहते हैं और दूसरों के पिण्ड देखकर तरसते रहते हैं । ऐसा वचन सुनकर श्री वषिष्ठ मुनि सब ऋषि-मुनियों के साथ अयोध्या भगवान रामचन्द्र जी के पास चले ।

               श्रीसनत्कुमार जी बोले-हे नारद! साठ हजार ऋषि-मुनियों को लेकर श्री वषिष्ठ जी भगवान रामचन्द्रजी के नगर अयोध्या में आये । भगवान श्री रामचन्द्र जी समस्त ऋषि-मुनियों को नमस्कार करते हुए ह्नदह से स्वागत किया तथा अत्यन्त सुन्दर स्थान में सबको ठहराया । भगवान रामचन्द्र जी समस्त ऋषि-मुनियों की सेवा सत्कार कने के लिये सैकड़ो दूत नियुक्त किये और नाना प्रकार के (छप्पन प्रकार के) मेवा मिष्ठान युक्त उत्तम भोजन बनवाकर सभी को भोजन करवाया । भोजन के उपरान्त श्री वषिष्ठ जी ने भगवान रामचन्द्र जी से कहा – हे रामचन्द्र जी ! आप अपने पितरों को प्रेत बाधाओं से मुक्त कराने के लिये और उनको स्वर्गलोक गमन करने के लिये गया में पितरों के निमित्त श्राद्धादि पिण्डदान करें । हमारी हार्दिक इच्छा यही है कि आप इस कर्म को करने में देर न करें ।

               श्री सनत्कुमार जी बोले-हे नारद! गुरु वषिष्ठ जी की आज्ञा पालन करने के लिये भगवान रामचन्द्रजी ने तुरन्त प्रतिज्ञा की और कहा- हे नाथ! इस कर्म (श्राद्धादि पिण्डदान) को गया जाकर शीघ्र करुॅगा । इतना वचन कहकर श्री रामचन्द जी गुरु वषिष्ठ सहित समस्त ऋषि-मुनियों को मुँह मांगा दान-दक्षिणा देकर विदा किया और गया चलने को तैयार हुए । एक दिन भगवान रामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण जी और सीताजी को साथ लेकर गया क्षेत्र में पधारे और सर्व प्रथम मुण्डन कराकर फल्गु सरिता में स्नान किया और विधि पूर्वक अपने कुल पितरों (पिता, पितामह आदि) को स्वर्गलोक के निमित्त गया क्षेत्र के वेदियों पर जाकर प्रेमपूर्वक श्राद्धादि पिण्डदान करने लगे । श्री सनत्कुमार जी बोले – हे नारद! जब रामचन्द्र जी रुद्रपद पर पिण्ड देने लगे तो दषरथ जी ने पिण्ड लेने के लिये दोनों हाथ फैलाये । रामचन्द्र जी से कहा कि हे पुत्र ! तुम मेरे हाथ में पिण्ड देते तो मुझे स्वर्ग न मिलता । यह कहकर दषरथ जी बहुत प्रसन्न होकर रुद्रलोक को चले गये । इसके बाद भगवान रामचन्द्रजी के इक्कीस कुल स्वर्गलोक को पहुॅच गये । यह गया महात्म्य जो मनुष्य पढ़ेंगे किसी दूसरे को सुनावेंगे उनको भी गया श्राद्ध का फल मिलेगा और अन्त में वे भी विष्णु लोक पहुॅचेंगे ।

श्री सनत्कुमार जी बोले – हे नारद! एक समय षिव जी पार्वती के साथ परिजात वन में विहार कर रहे थे । वहॉ धर्मव्रता के स्वामी मरीचि ऋषि फूल लाने को गये । षिव जी ने इनको देख यह श्राप दिया कि तुम काले हो जाओ । तब मरीचि ने बहुत स्तुति करके कहा- हे नाथ! मेरा उद्धार कैसे होगा । षिव जी स्तुति से प्रसन्न होकर कहा कि गया में तप करने से तुम्हारी मुक्ति होगी । यह सुन मरीचि गया आये ओर परमात्मा की कृपा से श्राप से मुक्त हो गये ।

               श्री सनत्कुमार जी बोले – हे नारद! विषाल पुरी के विषाल नामक राजा निःसन्तान थे । एक दिन उन्होंने विद्वावन ब्राह्मणों को बुलवाकर प्रष्न किया कि आप लोग कृपा कर यह बतायें कि मुझे पुत्र कैसे प्राप्त होगा । ब्राह्मणों ने कहा- हे राजन! गया में पिण्डदान करने से ही तुम्हें पुत्र होगा, जिस पर राजा ने गया में आकर विधि युक्त पिण्डदान किया। पिण्ड देते ही लाल व सफेद रंग के दो पुरुष दिखायी पड़े । राजा ने उनसे पूछा कि आप लोग कौन हो । सफेद रंग के पुरुष ने कहा – हम तुम्हारे पिता और ये तुम्हारे दादा है । गया श्राद्ध के पुण्य-प्रताप से हम दोनों घोर नरक से छूटकर इन्द्रलोक जा रहे है । और आषीर्वाद देते हैं कि तुम शीघ्र पुत्रवान होकर अन्त में इन्द्रलोक सिधारोगे । पितरों के आषीर्वाद से विषाल राजा को पुत्र हुआ ।

               श्री सनत्कुमार बोले-हे नारद! भारद्वाज मुनि जब कष्यपपद पर पिण्ड देने लगे तो काले और सफेद रंग के दो हाथ निकले, तब मुनि को बहुत सन्देह हुआ उन्होंने हुआ उन्होंने अपनी माता शान्ता से यह वृतान्त कह सुनाया तब शान्ता ने कहा – हे पुत्र ! तुम क्षेत्र और वीय इन दोनों पिताओं  के लिये कष्यपपद पर पिण्ड दो । श्री भारद्वाज मुनि ने माता की आज्ञा के अनुसार वैसा ही किया । तब वे दोनों पुरुष विमान में चढ़कर स्वर्ग को चले गये ।

               श्री सनत्कुमार बोले – हे नारद ! भीष्म जी जब गया क्षेत्र में पिण्ड दान करने लगे तब उनके पिता शान्तनु जी पिण्ड लेने के  लिये हाथ फैलाये । भीष्म जी ने शान्तनु जी के हाथ में पिण्ड न देकर वेदी पर ही दिया । तब शान्तनु जी ने अति प्रसन्न होकर कहा-हे पुत्र! मेरे आषीर्वाद से तुमको इच्छा-मुत्यु हो । यह कहकर वे स्वर्ग को चले गये ।

               श्री सनत्कुमार बोले-हे नारद! जब युधिष्ठिर पाण्डु षिला पर पिण्ड देने लगे तो उनके पिता पाण्डु ने कहा कि मेरे हाथ में पिण्ड दो । तब युधिष्ठिर ने वैसा न कर षिला पर पिण्ड दिया । षिला पर पिण्ड देने से पाण्डु ने प्रसन्न होकर कहा हे पुत्र । मेरे आषीर्वाद से तुम सदैव के लिये निःसन्देह स्वर्ग    जाओ । यह कहकर वे स्वर्ग को चले गये ।

               श्री सनत्कुमार बोले – हे नारद! एक समय भगवान श्री कृष्ण अपने पूर्वजों के निमित्त पिण्डदान करने के लिये गया पहुॅचे तब श्री वासुदेव जी (कृष्ण के पिता) प्रकट होकर कहने लगे हे पुत्र! अब मुझे आषा हो गई कि हम यम के बाधा से मुक्त हो जाएगें, इस पर श्रीकृष्ण ने कहा-हे पिता! आपको यम की बाधा कैसी? इस पर वासुदेव जी ने कहा-हे पुत्र! मैंने तुम्हारे जन्म से समय तुम्हारे मामा कंस के साथ छल किया था । इसलिये अब तुम हमारी बात मानकर पिता और माता दोनों कुल के नाम से पिण्ड दान करो तब ही मुझे यम बाधा से मुक्ति मिलेगी और मैं बैकुण्ठ वास करुॅगा । भगवान श्रीकृष्ण पिता की आज्ञानुसार दोनों (माता-पिता) कुल को पिण्ड दान दिया तब श्री वासुदेव जी बैकुण्ठ लोक को चले गये ।

               श्री सनत्कुमार बोले-हे नारद! एक समय हरिद्वार कुम्भ के अवसर पर गंगा नदी के किनारे समस्त ऋषियों का जमघट हुआ वहॉ सारे संसार के प्रायः सभी ऋषि मुनि जमा हुए और गंगा स्नान कर सब प्रसन्न हुए, तब आपस में विचार-विमर्ष करने लगे कि हे मुनियों! अब कुछ दिनों के बाद ऐसा समय आने वाला है जिसमें हम सभी ऋषियों-मुनियों का आदर-सत्कार खत्म हो जायेगा । इसलिये हम लोग भी बैकुण्ठ जाकर भगवान विष्णु के शरण में ही क्यों न वास करें तब एक ऋषि ने कहा- यह कैसे होगा तब शौनकादि ऋषिकादि ऋषियों ने कहा- यह तो सिर्फ गया क्षेत्र में भगवान विष्णु के चरण पर पिण्ड दान करने से ही हम सबको स्वर्ग लोक (विष्णु लोक) मिल जायेगा । इतना सुनकर समस्त ऋषि मुनि हरिद्वार से गया पहुॅचे और सब मिलकर भगवान विष्णु के चरण पर पिण्ड दान किया और समस्त ऋषि-मुनि उसी दिन सारे संसार से विष्णु लोक को चले गये ।

 

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